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Health Tips Hindi Good Care – Amar Book


Amar Book – Health tips hindi 

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पूज्य पिताजी का सम्पूर्ण जीवन प्रेरक तथा आदर्शपूर्ण रहा है।
उन्हांेने स्वंय अपने पुरूषार्थ व लगन से अपना जीवन बनाया व बिताया।
परिवार जनों की उन्नति व प्रगति में भरपूर सहयोग किया। वे सादा जीवन उच्च विचार की प्रतिमूर्ति थे। गृहस्थ की सम्पूर्ण जिम्मेदारियों का पूर्ण निष्ठा से पालन करने के साथ ही स्वाध्याय, साधना एवं सत्संग की भावना सदा हृदय में समाहित रही। वह दैनिक यज्ञ करते थे। परोपकारी कार्यो को सदैव सेवाभाव से करते रहे।

पूज्य पिताजी ने जीवन की सार्थकता के लिए पुरूषार्थी होना परमाश्यक माना। बचपन से ही अनेक कष्टो को झेला।सिलाई कार्य करते हुए ही परीक्षायें भी उत्तीर्ण की। सफलता प्राप्त होने पर लेखा परीक्षा विभाग में राजकीय सेवायें प्रदान कीं। वह सन् 2011 में जिला लेखा परीक्षा अधिकारी के सम्मानजनक पद से सेवानिवृत्त हुये। उनका जीवन सुखद,
शान्तिपूर्ण होने के साथ ही भावी पीढ़ियों के लिए प्रकाश स्तम्भ बन गया है। उन्हीं की प्रेरणा व पूज्य माता जी के आशीर्वाद से मैं इस पुस्तक को लिख पाया हूॅ। यदि इस पुस्तक द्वारा किसी को अंशमात्र भी लाभ होता हैं तो मैं
अपना प्रयास सार्थक समझूॅगा।

                        ।। ओउम् ।।

अध्याय – 1

हमारा शरीर(health tips in hindi)

क्या मैं स्वस्थ हूॅ? क्या मैं, मेरा परिवार, मेरे नगरवासी, देशवासी या
जिनको भी मैं जानता हूॅ, हम स्वस्थ हैं। क्या कभी जीवन को आगे बढ़ाने के लिए
नित्य नये विचारों को उत्पन्न करने, उन्हें पूर्ण करने के लिए सोचने, प्रसास
करने के साथ कभी किसी पल अपने इस शरीर के स्वास्थ्य के बारे में हम सोच
पाते हैं। यह शरीर हमारे सभी कार्यांे को करने मे अपने विभिन्न अंगों का योगदान
देता रहता है। शरीर मंे जितना भी सामथ्र्य होता है, हम चाहते हंै कि उसका पूरा
लाभ उठाते हुए हम जीवन के पथ पर नित्य नई उपलब्ध्यिाॅ प्राप्त करते रहें। हम
चाहते है कि हमें शरीर से100ः कार्यक्षमता प्राप्त हो, परन्तु क्या यदि शरीर
100ः कार्यक्षम न हो तो वह 100ः कार्यक्षमता प्रदान कर सकता है?

हम अपने स्कूटर, मोटरगाड़ी आदि वाहनों में जरा सी खराबी आने पर
उसे ठीक कराते हैं, क्योकि वाहन के किसी भी हिस्से में खराबी आने पर वाहन
नहीं चलता है और हमारे काम रूक जाते हैं। वाहन आदि ठीक प्रकार से कार्य
कर रहे हांे तब भी निश्चित समायान्तराल पर सर्विस कराकर वाहन की
कार्यक्षमता बनाये रखने का पूरा प्रयास करते हैं। इसी प्रकार टेलीविजन, फ्रिज,
कूलर इत्यादि मशीनों में भी यदि कहीं किसी भी भाग में खराबी आती है तो वे
काम करना बन्द कर देते है, और हमें परेशानी उठानी पड़ती है।

अब जरा हम अपने शरीर के बारे में सोचकर देखें, क्या हमारे शरीर के
सभी अंग प्रत्यंग ठीक ढ़ग से कार्य कर रहे हैं? क्या हमारे शरीर को कभी कोई
बीमारी नही हो रही है, आज के आधुनिक परिवेश में ऐसा मुश्किल ही है कि हमें
कोई बीमारी अर्थात् रोग न हो।

लेकिन यदि ऐसा हो कि हमें बहुत लम्बे समय से कोई रोग नहीं हो रहा है
तो भी क्या हम यह कह सकते है कि हम स्वस्थ हैं। जी नही, हम निर्जीव मशीेनें
नही हैं, जो हम उनसे अपनी तुलना करें कि यदि हमें कोई रोग नहीं हो रहा है तो
हम स्वस्थ हैं। हमारे शरीर में केवल अंग प्रत्यंग ही नहीें हैं बल्कि इसमें और भी
बहुत कुछ है, जिनका स्वस्थ होना आवश्यक है तब हम यह कैसे निश्चित करें कि
हम स्वस्थ हैं।

इसके लिए स्वस्थ व स्वास्थ्य को जानना आवश्यक है। हमारे
शरीर के भीतर विभिन्न अंग प्रत्यंग विद्यमान हंै। ये अंग-प्रत्यंग विभिन्न
कोशिकाओं ;ब्मससेद्ध के समूह से मिलकर बनते हैं। कोशिका शरीर की
सूक्ष्मतम इकाई है। अब यह सिद्व हो चुका है कि प्रत्येक कोशिका केन्द्रक,
माइट्रोकाॅड्रिया आदि विभिन्न रचनाओं से मिलकर बनती हैं, व स्वयमेव शरीर
स्वरूप हैं। शरीर में विद्यमान अनगिनत कोशिकाएॅ स्वंय पूर्ण स्वस्थ हांे तभी
हमारा शरीर भी स्वस्थ हो सकता है।

अध्याय – 2

स्वास्थ्य (HEALTH)

आचार्य सुश्रुत ने आज से हजारों वर्ष पूर्व स्वस्थ की निम्नलिखित
परिभाषा देकर पूर्णतः स्वस्थ व्यक्ति के लक्षणों का उल्लेख किया –

समदोष: समाग्निश्च समधातुमलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते।।

(सु0सू0 15/41)

अर्थात ‘‘जिस व्यक्ति के शरीर में तीनों दोष (वात, पित व कफ)
समावस्था (Equilibrium) में हो, शरीर में अग्नियाॅ (Metabolism &
Digestion) सम हो ;अर्थात् न मन्द, न तीक्ष्ण न विषमग्निद्ध, शरीर की रस,
रक्त आदि सातों धातुऐं (Tissue elements) सम हो, मल(Waste
Products)  यथा मूत्र, पुरीष व स्वेद सम हो, शरीर की सभी क्रियायें
(Activities) सम हो तथा साथ ही जिस व्यक्ति के शरीर में आत्मा (Soul),
इन्द्रियाॅ (आॅख, कान, नाक आदि ज्ञानेन्द्रियाॅ व हाथ पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ) व

मन प्रसन्न हो, ऐसा व्यक्ति या पुरूष स्वस्थ कहा जाता है।
महर्षि सुश्रत ने स्वास्थ्य की परिभाषा बताने वाले श्लोक की पहली
पंक्ति में शारीरिक स्वास्थ्य का वर्णन तथा दूसरी पंक्ति में आत्मा, इन्द्रिय व मन
के स्वस्थ रहने की महत्ता बताकर मानसिक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य को भी
स्वास्थ्य का अभिन्न अंग बताया है। निश्चित ही इन दो पंक्तियाॅें में सम्पूर्ण
स्वास्थ्य का व स्वस्थ व्यक्ति के लक्षणों का महत्वपूर्ण उल्लेख किया गया है।
आयुर्वेद में वर्णित वात, पित्त व कफ ये तीनों दोष शरीर के मूल आधार माने गये
हैं।
वात अर्थात् वायु प्राणवायु के रूप में हमारे शरीर का पालन करता है।
शरीरगत स्थान मंे से ही एक ही वायु प्राण, उदान, समान, व्यान, व अपान इन
पाॅच नामों से शरीर के विभिन्न भागों में विभिन्न कार्यो को सम्पादित करती है।
वायु चलायमान होती हैं।

पितः पंगुः कफः पंगुः पंगवो मलधातवः।
वायुना यत्र नीयन्ते तत्र गच्छन्ति मेद्यवत्।।

(शांडग्र्धर सं0)

अर्थात पित्, कफ, देह की सातों धातुएं तथा मूत्र, पुरीष आदि मल ये
सब पंगु हैं, क्योंकि ये शरीर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्वंय नही जा
सकते हैं।

इन्हे वायु ही इधर-उधर ले जाती है।
इसी प्रकार पित्त अग्नि व तेज का सूचक है। शरीर में जो कान्ति या
चमक होती है, वह पित्त से ही आती है। अग्नि गुण प्रधान होने के कारण खाये हुये
अन्न को पचाने में पित्त ही प्रमुख भूमिका निभाता है। कफ अर्थात् श्लेष्मा शीत व
चिकनापन जैसे गुणों वाला होता है। मनुष्य का जो बल व ओज है, वह मुख्यतः
कफ के ही कारण है।
ये तीनों दोष समावस्था में शरीर को धारण करते हैं तथा शरीर के
सम्पूर्ण क्रिया व्यापार को निर्बाध रूप से संचालित करते हैं। जब कभी किसी
कारण से किसी भी दोष का संतुलन बिगड़ता है, तब इस विषमता से शरीर का
भी संतुलन बिगड़कर रोग उत्पन्न हो जाता है।

ये दोष पहले स्वंय दूषित होकर
धातु व मलों को भी दूषित कर उनमें विषमता उत्पन्न कर देते हैं।
हम जो आहार ग्रहण करते हैं, उस पर पाचकाग्नि या जठराग्नि की
क्रिया होती है। इसे पाचन क्रिया ;कपहमेजपवदद्ध कहते हैं। जिसके फलस्वरूप
दोषों व धातुओं का तर्पण होता है। रस, रक्त, आदि धातुएं हमारे शरीर के
ज्पेेनम म्समउमदज हैं। जैसे रस च्संेउं या ॅंजमत च्ंतजए रक्त
;ठसववक ब्मससेद्धए माॅस ;डनेबनसंत ज्पेेनमद्ध, मेद़ ;।कपचवेम
ज्पेेनमेद्ध, अस्थि ;ठवदम ब्मससेद्ध, मज्जा (ठवदम डंततवू) व इन
सबका सार शुक्र धातु है।

इन धातुओं का स्वस्थ रूप में व सही परिमाण में
निर्माण तभी सम्भव है, जब पाचनकाग्नि न कमजोर हो और न ही बहुत ज्यादा
हो। पाचकाग्नि मे ंविषमता मुख्यतः मिथ्या या गलत आहार-विहार का सेवन
करने से होती है। हम कह सकते हैं कि स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए सभी
क्रियाओं की समावस्था ;म्ुनपसपइतपनउद्ध आवश्यक हैं।
शरीर व मन पर एक दूसरे का सीधा प्रभाव पड़ता है। यदि शरीर में
कोई रोग हो तो मन भी बेचैन रहता है, मन किसी कार्य में नही लगता है। इस
अनुभूति को सभी लोग स्वंय अनुभव करते हैं।

इसी प्रकार जब कोई मानसिक
रोग या मन में लम्बे समय तक कोई पीड़ा रहती है तो उससे शरीर में भूख न
लगना, बुखार आदि रोग हो जाते हैं। इसलिए महर्षि सुश्रुत ने शारिरिक स्वास्थ्य
के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी पूर्ण स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक
बताया है। इस विषय में महर्षि चरक ने भी निम्न वर्णन किया है-

नरो हिताहारविहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेत्वसक्तः।
दाता समः सत्यपरः श्रमावा नाप्तोपसेवी च भवत्थरोगः।।

(शरीर स्थान 2/46)

अर्थात् सदैव हितकारी आहार और विहार का सेवन करने वाला, हित
अहित ज्ञान पूर्वक कार्यो को करने वाला, विषयों के सेवन में आसक्ति नहीं रखने
वाला, सत्य आचरण व सत्य बोलने के प्रति निष्ठावान, क्षमावान व आप्तपुरूषों
की सेवा करने वाला मनुष्य निरोग रहता है।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्पूर्ण विश्व के मनुष्यों के स्वास्थ्य को बताने व
बरकरार रखने के लिए गठित विश्व स्वास्थ्य संगठन (world Health
Organisation) WHO ने भी स्वास्थ्य Health को केवल
Physical Health न मानकर Health की यह Definition  दी है।

“Health is Defined as a state of complete physical, mental, social
& spiritual well being and not merely the absence of disease or
infirmity.

कुछ समय पूर्व का भारतीय जनजीवन, रहन-सहन, आहार-विहार आदि
प्रकृति के अधिक समीप था। लोग कृत्रिम वस्त्रों, कृत्रिम पदार्थांे से बने भोजन व
कृत्रिम औषधियों (दवाईयों) का सेवन नही करते थे। प्राकृतिक परिवेश में
जीवन-यापन हमारी स्वास्थ्य रक्षा का सुदृढ़ आधार था। औषधि का प्रयोग
केवल बीमार होने की स्थिति में ही किया जाता था।

परन्तु धीरे-धीरे समय
बदलता गया व आधुनिकरण की सुविधाओं का लाभ उठाते-उठाते हम प्रकृति
से दूर होते चले गये। आज मनुष्य स्वस्थ होकर कष्टरहित जीवन व्यतीत करना
चाहता है। वह अपने आहार-विहार पर पूरा ध्यान देता है। जल्दी आराम देने
वाली औषधियों का सेवन करता है, फिर भी उसे न सुख मिलता है न स्वास्थ्य ही
मिल पा रहा है।
ऐसी स्थिति मंे निश्चित ही गहराई से सोचने की आवश्यकता है। हमें यह भी विचार करना चाहिए कि हमारा वर्तमान परिवेश कैसा है? हमे कैसा वातावरण मिल रहा है।

                                                                                ¯¯¯¯¯¯¯¯

अध्याय -3

वर्तमान परिवेश:
हमें कैसा वातावरण मिल रहा है।

विज्ञान एवं तकनीक के अभूतपूर्व विकास ने जहाॅ मानव को अनेक
सुविधायें प्रदान की है वहीं इन कृत्रिम उपादानों के प्रयोग ने मानव मात्र को
प्रकृति की गोद से अत्यन्त दूर कर दिया है। जल, वायु, प्रकाश जैसे
परमावश्यक उपादान, जो प्रकृति के नैसर्गिक अवदान है, से आज का मानव
वंचित होता जा रहा है।

हमने सभी प्राकृतिक स्त्रोतों को प्रदूषण के जहर से भर
दिया है। जल के प्राकृतिक स्त्रोतों का प्रदूषण, प्राणवायु में कल कारखानों का
अपरिमित जहर, जंगलो की अंधाधुंध कटाई द्वारा जीव आज अपने शरीर का ही
नहीं वरन् मानव सभ्यता का सबसे बड़ा शत्रु बनता जा रहा है। नये-नये रोगों का
प्रकाश में आना आज की नियति बन गई है। इन सबसे हमारे शरीर की रोग
प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) का निरन्तर हृास होता जा रहा है। शरीर की
रोग प्रतिरोधक क्षमता हमारे शरीर की वह स्वाभाविक शक्ति है जो हमें अनेक
बीमारियों से बचाये रखती हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता के हृास का मूल कारण
प्रकृति से दूर रहना व आहार-विहार का असंयम प्रतीत होता है।

हमारा आहार (खाना-पीनाद्ध )

आज के युग में फास्ट फूड्स, फूड प्रिजर्वेटिव्स, संश्लेषित आहार व
पेय अत्यन्त प्रचलित हो गये हैं। इनसे सबसे ज्यादा आक्रान्त हमारे नवयुवक व
बच्चे हैं, जो हमारा भविष्य हैं। यह आहार हमारे शरीर में कमजोर पाचन तंत्र,
कब्ज, मोटापा, आॅतों के रोग, मधुमेह, हृदय रोग, आदि अनेक व्याधियाॅ उत्पन्न
करते हैं।
वर्ष 2001-2003 के बीच 9000 अमेरिकियों के खानपान पर पहली बार
हुए राष्ट्रीय सर्वे में लोगों के स्वास्थ्य मे काफी विकृति पाई गई। 0.9 फीसदी
महिलाएॅ व 0.3 फीसदी पुरूष ।दवतमगपं रोग से ग्रसित व 1.5 फीसदी
महिलाएं और 0.5 फीसदी पुरूष बुलीमिया रोग के शिकार पाये गये। शिकार
लोगों में अधिकांश उन लोगों की संख्या है जो फास्ट फूड और अनियमित भोजन
का सेवन करते हैं।

रासयनिक प्रदूषक युक्त आहार कम मात्रा में जहाॅ वयस्कों के लिए
अधिक हानिकारक नहीं होते वहीं शिशुओं के मामले में कम या ज्यादा सभी
प्रदूषक घातक होते हैं। इस तथ्य को दुनिया के अधिकतर विज्ञानियों ने स्वीकारा
है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के अध्ययनकत्र्ताओं के
अनुसार पूरे देश में लगभग 20 करोड़ से भी अधिक दम्पति माता-पिता के सुख
से वंचित हैं जबकि पहले ये आंकड़े 10 करोड़ ;10 फीसदीद्ध के आसपास थे।
अध्ययनकत्र्ता के अनुसार Infertility  का मुख्य कारण तो आनुवांशिक होता
है,

लेकिन पेस्टिसाइड, तापमान, मोबाइल फोन भी प्रमुख कारणों में शामिल है।
कानपुर स्थित चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्यागिकी विश्वविद्यालय
के विज्ञानियों द्वारा किये एक शोध में लिए गए 51 सैंपलों में गेहूॅ के आटे में कई
घातक रसायनो की पुष्टि हुई है। जहाॅ 1970 में प्रति हेक्टेयर सिर्फ 18 किलोग्राम
रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग होता था, बढ़ते-बढ़ते वह 129 कि0ग्रा0 प्रति
हेक्टेयर पहुॅच गया है। इससे गेहूॅ की औसत उत्पादकता तो बढ़ी है पर उर्वरकों के
अति सूक्ष्म घातक तत्वंों से गेहूॅ जहरीला होता जा रहा है। इन रासायनिक
उर्वरकों में डी.डी.टी., लिंडेन, क्लोरोडेन, इंडोसल्फान, बी.एस.सी.,
गैमक्सीन, यूरिया प्रमुख है।

जहाॅ तक पानी की बात है तो विशेषज्ञों द्वारा किये जा रहे शोध से यह
बात सिद्व हो चुकी है कि पहाड़ से बहकर आने वाली गंगा तथा अन्य नदियों में
ऐसा जहरीला पदार्थ मौजूद है जो मैदानी क्षेत्रों के भूमिगत जल मे जहर घोल
रहा है। यह आरसिनोपाइराट (Arsinopyrite) नामक पदार्थ नदियांे के
मोड़ के मुहाने पर ज्यादा पाया जाता है।जो नदियाॅ जीवन देने के कारण करोड़ों
लोगों की आस्था का प्रतीक हुआ करती थी, व अब भी है, वे ही नदियाॅ अब मौत
बांटने का काम भी कर रही है।

एक सर्वे के अनुसार वेस्ट यूपी (पश्चिमी उत्तर
प्रदेशद्) से गुजरने वाली यमुना, काली नदी, हिंडन, ढमोला जैसी नदियों में
लेड, क्रोमियम, मरकरी, लौह आदि तत्व घुले हैं। इन नदियों के किनारे बसे हुए
लोगों में पेट के रोग, कैंसर, क्षय रोग, हृदय रोग, मस्तिष्क रोग, उच्च व निम्न
रक्तचाप जैसी खतरनाक बीमारियाॅ उत्पन्न हो रही हैं।

पानी के अन्दर प्रदूषण दो तरह से फैलता है। पहला नदियों व नालों के
पानी को काला व बदबूदार कर देता है। जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है। दूसरा
प्रदूषण रासयनिक खादों, कीटनाशक व उद्योगों से निकले प्रदूषित पानी द्वारा
फैलता है जो दिखाई नही देता। यह जल प्रदूषण बहुत खतरनाक होता है। बढ़ते
जल प्रदूषण से नदियों के जल के अलावा भूगर्भ जल भी बुरी तरह प्रभावित हो
रहा है।

जीवनचर्या (Life Style) Health

आज जीवन जीने का तरीका अर्थात् Life Style कुछ ऐसी हो गई है
कि जीवन स्वस्थ रहकर सुख से जीने के बजाय सिर्फ अपनी जिम्मेदारियाॅ पूरी
करना व अनावश्यक भौतिक सुख सुविधाओं के साथ तनावपूर्ण जीवन जीना ही
Life Style बन गया है। पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण व पारम्परिक

नैतिक मूल्यों के अवमूल्यन से क्षोभ जन्य विकारों (Stress Disorders) की
संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। उच्च रक्तदाब (High Blood
Pressure)  हृदयरोग (Heart Disorders), गठिया (Gout), तथा
मधुमेह (Diabetes) इसके प्रमुख उदाहरण है। पूरे विश्व में लगभग 40
करोड़ मधुमेह रोगी है। 6 करोड़ लोगों के साथ भारत मंे चीन के साथ दुनिया के
सबसे अधिक मधुमेह रोगी है।

प्रातः काल देर से उठना, रात मंे देर से सोना, (मौसम) प्रतिकूल
कार्य करना, फास्ट फूड व कोल्ड डिंक्स जैसे निकृष्ट आहार लेना हमारे
तथाकथित बड़प्पन की निशानी बन गये हैं। आज ‘एड्स’ की समस्या मानव
सभ्यता के सामने सबसे बड़े शत्रु के रूप में उपस्थित है। इसका प्रमुख कारण
अंसयमित काम इच्छा है।

जो वर्तमान Life Style की अनैतिकता से ज्वलन्त
रूप धारण करती जा रही है। संयम ही इस स्थिति में भारतीय संस्कृति का मूल
मंत्र माना गया है। हमारे महर्षियों ने स्वस्थ काम की परिकल्पना कर स्त्री को
धर्मपत्नी तथा काम को धर्म, अर्थ तथा मोक्ष जैसे पुरूष चतुष्टय का एक अभिन्न
अंग स्वीकार किया है। आयुर्वेद में वर्णित इस अचूक कवच से हम ‘एड्स’ जैसे
शत्रु से मानवता की रक्षा कर सकते हैं।
उच्च रक्तचाप (High BP), हृदयरोग, डायबिटीज आदि Life Style Disorders का प्रमुख कारण आहारचर्या का पालन न करना है अर्थात् फास्ट
फूड जैसे निकृष्ट आहार लेना और वह भी बिना किसी विधि के जैसे जब भी जो
मिला खा लिया और क्रियात्मकता का अभाव अर्थात् अधिकतम कार्य मशीनी
उपकरणों से होना और अपने हाथ पैरों का अभ्यास न हो पाना। ऐसी Life
Style से मोटापा बढ़ता है। जो अनेक बीमारियों के उत्पन्न होने का मूल कारण
बन जाता है।

संश्लेषित औषधियाॅ
(Chemical Drugs)

आज विश्व भर मंे अनेक प्रकार की चिकित्सा सुविधाएॅ हैं। प्रत्येक विद्या
की अपनी सीमाएॅ होती है। एलोपैथी भी उन्हीं मंे से है।
संक्रामक रोगों में प्रयुक्त होने वाली Antibiotics अत्यन्त प्रभावी व
आशुकारी है तथा दर्द निवारक औषधियाॅ पल भर में दर्द से परेशान रोगी को
राहत पहुॅचाती हैं।health tips in hindi

तथापि उच्च रक्तचाप, हृदयरोग, मधुमेह, श्वासरोग,
गठिया, आदि रोगों की लाक्षणिक चिकित्सा से हटकर इनके समूलनाश के लिए
इस विद्या की भी कुछ सीमा है। साथ ही एन्टीबायोटिक्स तथा दर्द निवारक
औषधियों के दुष्प्रभाव से आज सभी अवगत है। Chemical Drugs में
नोवालजिन, निमुलिड आदि कई औषधियाॅ दुनिया के अधिकांश देशों मंे
प्रतिबंधित हैं, मगर ये भारत में इस्तेमाल हो रही है।

इन दवाईयों को प्रतिबंधित
करने की सीधी वजह शरीर पर इनके दुष्प्रभाव है। नोबालाजिन में मौजूद
एनालजिन नामक तत्व अस्थि मज्जा (Bone Marrow) में दबाव की
स्थिति उत्पन्न करता है। Acidity या Hyperacidity  में प्रयोग होने वाली
सीजाप्राइड के बारे मंे शोधकत्र्ताओं का दावा है कि यह दिल की धड़कनों को
असामान्य बना देता है। कुछ समय पूर्व वायोक्स नामक दवा को अमेरिका के
बाजार में, लाइसेंस मिल गया, मगर कुछ दिनांे बाद वहाॅ दवाईयों को लाइसेंस
देने वाली संस्था यू0एस0एफ0 डी0आई0 ने उस पर प्रतिबंध लगाकर दवा
बाजार से हटवा दी।

कारण यह था कि इस दवा के हृदय पर दुष्प्रभाव होते हैं। ये
सब औषधियाॅ संश्लेषित रसायनों से बनती है जिससे इनका शरीर में
सात्म्यीकरण विजातीयता के कारण नही हो पाता है। अतः हमें ऐसी औषधियों
का प्रयोग करना चाहिए, जिनका जैव रासायनिक संगठन हमारे शरीर से साम्य
रखता हो, जैसे-शुद्वता से बनी आयुर्वैदिक औषधियाॅ।

हमारे सामने सबसे पहला प्रश्न अब यह उठता है कि पूर्ण स्वस्थ्य कैसे
बने? क्या खायें? क्या पियें? कैसे वस्त्र किस मौसम में पहनंे? कैसे रहें?
मानसिक विचार कैसे हांे, कि हम स्वंय को पूर्णतः स्वस्थ्य बनाकर दीर्घायु व
सुखायु प्राप्त करें। अर्थात् स्वस्थ रहने के लिए दिनचर्या, आहारचर्या
(भोजनविधि) आदि किस प्रकार हो।

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अध्याय – 4
स्वस्थ रहने के उपाय
दिनचर्या (Daily Regimen)

दिन और रात में सेवन करने योग्य आहार व विहार को दिनचर्या कहते
हैं। प्रातः काल उठने से लेकर रात्रि में सोने तक दिनभर में खाने-पीने, वस्त्र
पहनने, स्नान करने आदि दैनिक कर्मो में जिन विधियों व नियमों के पालन करने
से हम शारीरिक, मानसिक आदि सभी प्रकार का सुख प्राप्त कर सकंे, ऐसी
विधियों का वर्णन दिनचर्या में आता है।

1. जागरण (जागना)

ब्राह्मे मुहूर्त उत्तिष्ठेज्जीर्णाऽजीर्णे निरूपयन्,
रक्षार्थ मायुषः स्वस्थो।।

(अं0सं0 सू0 स्थान 3/3)

अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति को ब्रह्म मुहूर्त में ;सूर्योदय से दो घंटा पूर्व अर्थात्
प्रातः 4.00 बजे से प्रातः 6.00 बजे तकद्ध उठ जाना चाहिए। उठकर अपने ईष्ट
देव का स्मरण करना चाहिए। इस समय वातावरण में शान्ति, स्वच्छता व
प्रसन्नता छाई रहती है, जिससे हमें भी मानसिक शान्ति व प्रसन्नता प्राप्त होती
है। इस समय उठने पर शौच आदि नित्यकर्म करने का पर्याप्त समय भी मिल
जाता है।

अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति को ब्रह्म मुहूर्त में ;सूर्योदय से दो घंटा पूर्व अर्थात्
प्रातः 4.00 बजे से प्रातः 6.00 बजे तकद्ध उठ जाना चाहिए। उठकर अपने ईष्ट
देव का स्मरण करना चाहिए। इस समय वातावरण में शान्ति, स्वच्छता व
प्रसन्नता छाई रहती है, जिससे हमें भी मानसिक शान्ति व प्रसन्नता प्राप्त होती
है। इस समय उठने पर शौच आदि नित्यकर्म करने का पर्याप्त समय भी मिल
जाता है।
देर से उठने वालों को जल्दी-जल्दी सब काम भाग दौड़कर करने
पड़ते हैं, जिससे मानसिक अंशाति सुबह से ही उनके दिमाग में रहती हैं और
दिन भर क्रोध, चिन्ता व चिढ़चिढ़ापन बना रहता है।

2. जलपान (ऊषःपान)
प्रातः उठकर मुॅह धोकर प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन खाली पेट कम से
कम 1 गिलास व अधिकतम 4 गिलास पानी अवश्य पीना चाहिए। Diabetes
के रोगियों को ताम्रपात्र (तांबे का बर्तन) में विजयसार लकड़ी का टुकड़ा
डालकर पानी भरकर रात को रख देना चाहिए। प्रातः काल उन्हे यही पानी पीना
चाहिए। शीत )तु मंे हल्का गुनगुना पानी (Lukewarm Water) पीना
चाहिए। इससे मल व मूत्र त्याग ठीक प्रकार से होकर शरीर के विषैले तत्व बाहर
निकल जाते हैं।

आजकल लोग जल के स्थान पर चाय (Bed Tea) का सेवन करते
हैं। यह गर्म व उत्तेजक चाय आंतांे पर दबाव डालकर मलत्याग की प्रकृति तो
उत्पन्न करती है परन्तु यह उत्तेजक प्रभाव कुछ दिनों बाद समाप्त होने लगता
है। तथा व्यक्ति पुनः कब्ज का शिकार हो जाता है। साथ ही चाय व काॅफी में पाया
जाने वाला Caffeine आमाशय तथा आंतो की ग्रंथियों पर बुरा प्रभाव डालता
है। साथ ही यह Acidity बढ़ाकर आॅतों व आमाशय में Ulcer उत्पन्न करता
है। जबकि जल के सेवन से किसी प्रकार का कुप्रभाव नही होता है।

3. मलत्याग
मलत्याग नियमित रूप से प्रातः काल में करना चाहिए। आज के
तनावपूर्ण जीवन में कुछ लोगों को समय पर मल का अनुभव नहीं होता। इसके
कई कारण हो सकते हैं-जैसे रात में खाये भोजन का न पचना, मानसिक
अंशाति, पूरी नींद न होना आदि। इन कारणों तथा भारी दालों व तले हुए भोजन
के सेवन से रात को आॅतों में वायु का संचय हो जाता है। इससे मल त्याग में
रूकावट पैदा हो जाती है। थोड़ा मलत्याग करने पर लगता है कि पूरा पेट साफ
हो गया है जबकि थोड़ी देर बाद पुनः मलत्याग की इच्छा होने लगती है।
पेट पूरी तरह साफ न होने से भूख समाप्त हो जाती है अथवा कम हो
जाती है तथा गैस, अपच, सिरदर्द, बेचैनी, सुस्ती आदि परेशानियाॅ उत्पन्न हो
जाती है। कब्ज रहने से जुकाम, दमा, जोड़ों का दर्द, दिल की धड़कन आदि
भयंकर रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

समाधान के लिए वायुकारक पदार्थ कम लेने चाहिए। भोजन में रेशे
(fiber)  वाले फल व सब्जियाॅ जैसे मेथी, पालक आदि पत्ते वाली सब्जियाॅ,
तोरी, पपीता, सेब आदि लेने चाहिऐ। पानी भी दिनभर मंे पर्याप्त मात्रा में पीना
चाहिए।

4. दाॅतों की सफाई
कड़वे, तीखे या कसैले रस वाले दातून का प्रयोग दाॅत साफ करने के
लिए करना चाहिए। टहनी 6‘‘ के लगभग होनी चाहिए। जिससे पकड़ने में
सुविधा हो। इसे चीरकर जीभ भी साफ की जा सकती है। कनेर, करंज, नीम
आदि वृक्षांे की दातुन अधिक उपयुक्त होती है।

आजकल Toothbrush का इस्तेमाल किया जाता है।
Toothbrush Soft होना चाहिए। एक-एक दाॅत को ऊपर से नीचे व नीचे
से ऊपर को साफ करना चाहिए। चूर्ण या मंजन का भी प्रयोग किया जा सकता है
दाॅत और जीभ साफ करने से दाॅत, जीभ व मुॅह की मैल और दुर्गन्ध दूर
होते हैं, दाॅत साफ व मजबूत होते हैं।

5. अभ्यंग (तैल मालिशद्ध)
तैल मालिश करने से शरीर की त्वचा मजबूत व मुलायम होती है। वायु
जनित रोग शरीर पर आक्रमण नहीं कर पाते। शरीर की दुर्गन्ध, मैल, खुजली,
पसीने की बदबू, तन्द्रा दूर होती हे।
मालिश धीरे-धीरे करनी चाहिए व रोमांे की दिशा में करनी चाहिए।
मालिश धूप में ही करनी चाहिए। जिस दिन आसमान मंे बादल छाये हो तब व
धूप न होने की दशा में मालिश नहीं करनी चाहिए। Read more health tips hindi

 

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